बात “छपाक” की

छपाक का विषय बेहद गम्भीर और ज़रूरी है, जिस कारण से इसे ज़रूर देखना चाहिए और जिन लोगों ने भी इस फ़िल्म के विरोध में बॉयकॉट किया उन्हें भी, बाक़ी जिन्हें देखनी थी उन्होंने तो देख ली और जो देखना चाहते हैं वो भी इस शुक्रवार से पहले देख जाएँगे बाक़ी इसका हॉट स्टार पर आने का इंतज़ार करेंगे।

ख़ैर, फ़िल्म के सभी कलाकारों की कास्टिंग सटीक और अभिनय सभी का उम्दा है , दीपिका पादुकोण का भी लेकिन…

दीपिका कुछ जगह ओवर ऐक्टिंग करती दिखाई पड़ती हैं, स्कूल के द्रश्यों में वे बिल्कुल भी प्रभावी नहीं लगी और ऐसा लगा कि दीपिका की जगह किसी और को होना था इस फ़िल्म में।

पर वे इस फ़िल्म की निर्माता हैं और शायद विषय के साथ सहानुभूति की वजह से इस किरदार को वे स्वयं जीना चाहती होंगी जो उन्होंने बखूबी जिया भी पर स्कूल के द्रश्य आते ही सब फिस्स हो गया कम से कम मेरे लिए, लेकिन बाक़ी के द्रश्यों में वे पूर्ण भाव में थी।

इन्हीं छोटी बड़ी और बाक़ी की वजहों से छपाक, एक अच्छी और यादगार फ़िल्म बनते बनते रह जाती है… फ़िल्म में कुछ द्रश्यों को छोड़ दें तो पूरी फ़िल्म के दौरान मालती का दर्द हमें नज़दीक से सालता ज़रूर है पर हम चाहकर भी उसके दुःख के साथ रह नहीं पाते।

जबकि इस तरह के विषय पर बनी फ़िल्मों में विषय की संवेदनशीलता के अतिरिक्त किरदार से रिश्ता बनना बेहद ज़रूरी होता है जो छपाक में मालती से नहीं बन पाता जबकि असल ज़िंदगी में हम लक्ष्मी को देखते ही पीड़ा से भर जाते हैं… इसका तर्क रील और रियल लाइफ़ से दिया जा सकता है पर उसमें पड़ने की ज़रूरत फ़िलहाल नहीं है।

फ़िल्म मालती के इर्द गिर्द घूमते हुए भी मालती की और अन्य ऐसिड अटैक सरवाईवर की निजी व्यथा के अंतर्द्वंद से दूर रहती है जिस कारण से जो लगाव और भाव दर्शक और फ़िल्म के बीच बनना था वो छूट जाता है और मालती पर हुआ अटैक उतना दर्द और पीड़ा नहीं कह पाता कि दर्शक उसके साथ रो उठता और दोषी से बेपनाह नफ़रत करता। छपाक के साथ जो सबसे ग़लत हुआ वो ये कि रील लाइफ़ में इसका विलन बेहद कमज़ोर साबित हुआ जबकि रियल लाइफ़ में वो इतना मज़बूत है कि आज भी वो खुले-आम लड़कियों को अपना शिकार बना रहा है।

फ़िल्म के कुछ संवाद छपाक को बड़ा बनाते ज़रूर हैं पर कमज़ोर पटकथा से फ़िल्म समय बढ़ने के साथ और धीमी पड़ती है और जो फ़िल्म इंटरवल में ख़त्म सी समझ आ रही थी वह आगे के हिस्से में भी विषय के साथ संघर्ष तो दिखाती है पर उसमें हमें शामिल नहीं कर पाती और हमें बार बार घड़ी देखने को विवश करती है पर हम मालती और अन्य लड़कियों पर हुए भयानक हादसे की पीड़ा को सहने का साहस करते हुए फ़िल्म के अंत तक आ ही जाते हैं जो एक और छपाक के हादसे के साथ ख़त्म होती है।

छपाक जैसे विषय पर फ़िल्म की पहल सराहनीय है, और इसके लिए मेघना गुलज़ार, दीपिका पादुकोण और पूरी टीम बधाई की पात्र है।

पर इस फ़िल्म को इससे कई गुना बेहतर होना था, जो रह गया पर कोई बात नहीं कम से कम कोशिश तो हुई।