बात ‘शिकारा’ की

This film is a true love letter of Kashmir by Vidhu Vinod Chopra Films 

शिकारा के सभी पोस्टर और पहले आधिकारिक ट्रेलर में जो दिखाया गया और जिस तरह की बात हुई वो फ़िल्म से मेल नहीं खाती। यह फ़िल्म एक टाइमलेस लवस्टोरी ही है जो कि वर्स्ट टाइम में जन्म लेती है ना कि जैसा फ़िल्म के पोस्टर पर टाइटल के साथ लिखा था “The untold story of Kashmiri Pandits”

विधु विनोद चोपड़ा की “शिकारा” जो कश्मीर के संदर्भ में बनी उनकी दूसरी फ़िल्म है, पहली फ़िल्म “मिशन कश्मीर” थी जो कश्मीर में पनप रहे आतंकवाद की व्यथा को कहती थी और कहीं ना कहीं उस बात को अंडरलाइन भी करती थी कि एक नौजवान किस तरह ग़लत लोगों और उनके भटकाव से आतंकवादी बन जाता है।

जबकि, शिकारा”, “मिशन कश्मीर” के अगले हिस्से की फ़िल्म ना होकर उसकी एक डोर को थामे रखती है जो शिकारा के एक महत्वपूर्ण किरदार लतीफ़ के साथ फ़िल्म में साथ रहती है, जो एक बेहतरीन बल्लेबाज है और रणजी खेल चुका है पर घाटी की आबोहवा के बदलने पर वो आतंक की राह चुन लेता है, और इस आतंक से अपने कश्मीरी पंडित दोस्त को बचाता भी है और सलाह भी देता है कि “मैं तो अपने अब्बा को ना बचा सका पर तुम अपने अब्बा को ज़रूर बचा लेना।”

असल में लतीफ़ का ये पूरा संवाद ही शिकारा के उद्देश्य को कह जाता है, और लतीफ़ आख़िर में ख़ुद के किए गुनाह के लिए माफ़ी भी माँग लेता है, वो माफ़ी जो एक और किरदार से जुड़ी होती है पर वो किरदार कश्मीरी पंडितों का प्रतिनिधि बन जाता है इस जगह…

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ख़ैर फ़िल्म शिकारा जो कि रिलीज़ के पहले तक एक ज़रूरी फ़िल्म और फ़र्स्ट ट्रेलर आने के बाद से सबकी चहेती बनी हुई थी पर रिलीज़ होते ही बहुत से कश्मीर पंडित इसके विरोध में आ गए, एक विडियो भी जो खूब वाइरल हुआ जिसमें एक महिला विधु विनोद चोपड़ा की उपस्थिति में उन्हें उनकी फ़िल्म में सच्चाई ना दिखाने के लिए उन्हें कोस रही थी,फिर बाद में सोशल मीडिया पर शिकारा के बॉयकॉट का हैश्टैग भी खूब ट्रेंड हुआ, ठीक वैसे ही जैसे छपाक के समय हुआ था, फिर बाद में फ़िल्म के नीचे लिखे टैग में फेरबदल को लेकर नाराज़गी भी।

कुल मिलाकर फ़िल्म पीछे रह गयी, और लोगों का विरोध सफल हुआ।

मैं ख़ुद भी इस विषय पर अपनी कोई बात इसलिए नहीं कह पा रहा था कि मैंने ये फ़िल्म नहीं देखी थी, पर कल देखने के बाद मेरी अपनी एक राय बनी है ज़रूरी नहीं इससे सबकी सहमति बने, पर मेरी राय विरोध के समर्थन में नहीं गयी।

हाँ, सहमति इस बात से ज़रूर है कि इस फ़िल्म को जिस तरह प्रचारित किया गया वो फ़िल्म में नहीं है, यह एक बेहद साधारण युगल जो कि कश्मीरी पंडित है के विस्थापन उनके दर्द की कहानी है, कश्मीर में विस्थापन का वो दर्दनाक हिस्सा इसमें है पर वो बैक्ड्राप में ही रहता है, फ़िल्म के मुख्य हिस्से में उसका ज़िक्र आता ज़रूर है पर ऑन स्क्रीन दिखता नहीं, विस्थापन के समय कश्मीर में आज़ादी के नारे हमें फ़िल्म देखते समय सुनाई देते हैं, पर वो विचलित करने वाले द्रश्य नहीं, जो कि निर्देशक की अपनी स्वतंत्रता है कि वह अपनी कहानी को कैसे कहे और दिखाए।

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फ़िल्म शिकारा मूल रूप से “डॉ. शिव कुमार धर – शांति धर” की कहानी है जो कि एक कश्मीरी पंडित हैं जो यूँ ही अचानक एक फ़िल्म के सेट पर मिलते हैं और पहली मुलाक़ात वाला प्यार और फिर शादी। शिव – शांति शादी के कुछ समय बाद अपना ख़ुद का घर बनवाते हैं जिसकी नींव के लिए पत्थर शिव के जिगरी दोस्त लतीफ़ के अब्बा अपने खेत से देते हैं और लतीफ़ ख़ुद इसे लेके आता है, और जब घर बन तैयार होता है तो शांति उस खूबसूरत से घर का नाम शिकारा रखती है, जिसे बाद के बदले हुए माहौल में उन्हें यूँ हीं छोड़ के जाना पड़ता है और फिर वो दोनों कभी शिकारा में वापस नहीं लौटते, इस बीच जब वे शरणार्थी कैम्प में रह रहे हैं वहाँ भी कहानी शिव और शांति के आसपास ही रहती है और उनके उस दर्द को उकेरती रहती है जब उनसे उनका अपना घर छूटा था, कैसे उनके पड़ोसी हाजी साब ने उनके घर पर क़ब्ज़ा जमाने की कोशिश की। एक छोटा सा सीन भी है उस शरणार्थी कैम्प का जब एक आदमी कश्मीर से उनके घर शिकारा को ख़रीदने की बात करने आता है, लेकिन उसके बदन पर शिव को वही कोट मिलता है जो उसके टीचर- दोस्त नवीन का था जो उनसे उन लोगों ने छिना था जब बीच चौराहे उनकी गोली मार के हत्या कर दी गयी थी।

इसके अलावा फ़िल्म में कुछ और सीन शरणार्थी कैम्प के हैं, जिन्हें देख दिल रोता है, जैसे एक बूढ़ा दिन रात मुझे कश्मीर लेके चलो की रट लगाए हुए है फिर एक रात का सीन है जब कश्मीरी पंडितों से भरे हॉल में एक कोने से बच्चे के रोने की आवाज़ पूरे हॉल में कैसे सन्नाटे में पसर जाती है और हम तम्बुओं का पूरा जाल देखते हैं जिनमें छोटे छोटे खाने कपड़ों को जोड़कर बनाए गए हैं और उसपर अंधेरे की डरावनी आवाज़… वो पूरा सीन बिना शोर किए डरा जाता है।

इस फ़िल्म की एक ख़ासियत ये भी है कि इस फ़िल्म में हम गोली, बंदूक़ और धमाकों से नहीं बल्कि सन्नाटे और चुप्पी से डरते हैं, उस चुप्पी से जो उन लोगों के ज़हन में बस सी गयी है जो 19 जनवरी की रात के अंधेरे से अब तक जूझ रहे हैं और अपनी उस सुबह के इंतज़ार में हैं जब वे वापस पूरी आज़ादी और सुरक्षा के साथ अपने घर कश्मीर जा सकें। फ़िल्म में एक सीन और भी आता है जब एक शादी के फ़ंक्शन में शांति को उस समय बज रहे संगीत जिसपर लोग थिरक रहे हैं, में उन पत्थरों की आवाज़ सुनाई देती है जो 30 साल पहले उसके घर पर फेंके गए थे, कैमरे के फ़्लैश में उसे वो आग दिखाई देती है जिससे उसका घर जलाया गया था। ये सब बिना किसी मारकाट के दिखाया जाता है और हमें उस दर्द का आभास भी होता है जो हर एक कश्मीरी पंडित ने झेला है पिछले 30 सालों में।

लेकिन… फिर भी यह फ़िल्म कश्मीरी पंडितों के विरोध को क्यों झेल रही है ?? 

क्योंकि यह फ़िल्म, कश्मीरी पंडितों के उस दर्दनाक लम्हों को तनिक भी नहीं उकेरती जिसे हम अब तक पढ़ते और देखते रहे हैं, उसकी एक वजह ये भी है कि यह फ़िल्म उस विषय पे बात नहीं करना चाहती जिसमें वो बर्बरता शामिल है जिसका गवाह पूरा देश रहा है पर फिर भी आज तक उस बर्बरता पर कोई कार्यवाही नहीं हुई और ना ही उन लोगों को कश्मीर में दोबारा बसाने की पहल पर कोई ठोस क़दम उठाया गया, वर्तमान सरकार ने पहल की है जो एक उम्मीद ज़रूर जगाती है। इसके अलावा फ़िल्म के एक सीन में ही जब कश्मीरी पंडितों का पूरा हुजूम कैम्प में इकट्टा है जिसमें हम उन असली लोगों को भी देखते हैं जो 30 साल पहले कश्मीर, अपने घर को रातों रात छोड़ भागे थे ताकि वे अपनी और परिवार की जान बचा सकें, लेकिन उस रात के बाद से वे अपने ही देश में शरणार्थी बन कैम्प में रहने को मजबूर हुए। इसी कैम्प में एक सीन भी है जिसमें एक कश्मीरी पंडित कुछ लोगों को दिलासा दिलाते हुए कहता भी है कि “परेशान मत हो, हम लोगों को कोई अपने घर से नहीं निकाल सकता… तुम देखना कल सुबह होते ही पर्लियामेंट में हमारे लिए आवाज़ें उठेंगी और अगले 6-7 दिन की बात है हम सब फिर से अपने घरों में होंगे”, पर अगले दिन ना बात हुई और ना बहस… पूरे 30 साल बीत गए उस बात को और हम आज भी उन्हें उनका घर ना दिला सके।

विधु विनोद चोपड़ा ने इस फ़िल्म को अपनी माँ और पत्नी को समर्पित किया है, उनकी माँ जो 1989 में मुंबई परिंदा की स्क्रीनिंग के लिए आयीं तो थी पर वो वापस कभी लौट ना सकीं। वो अपने जीते जी बस एक बार अपने घर कश्मीर जा पाईं थी जब विधु अपनी फ़िल्म मिशन कश्मीर शूट कर रहे थे और उस दौरान जब वे अपने घर गयी थीं तो उस समय का वो एक 5 मिनट का विडियो भी अभी हाल में शेयर किया गया था, उस 5 मिनट के विडियो में बहुत कुछ है जो इस फ़िल्म में बर्बरता के ना होने को जायज़ ठहराता है जिसमें विधु चोपड़ा की माँ शांति चोपड़ा एक जगह मुस्कुराते हुए कहती भी हैं “चलो कोई नहीं… सामान ही ले गए, कम से कम घर तो नहीं जलाया” और हंसती हैं। अपने घर लौटने पर एक बार भी वो उन लोगों पर नाराज़ नहीं होती और ना ही उस बर्बरता की बात करती और ना पूछती हैं बल्कि वो घर के सब हिस्सों को महसूस करते हुए ख़ुश होती हैं कि चलो अच्छा हुआ ये घर बचा रहा।

मुझे लगता है यही एक मुख्य कारण होगा कि विधु ख़ुद भी उन दर्दनाक लम्हों को स्क्रीन पर फिर से नहीं दोहराना चाहते होंगे, जिस वजह से उन्होंने विस्थापन को संदर्भ में रखते हुए प्रेम का रास्ता चुना और ऐसी कहानी चुनी जिसमें वो कश्मीरी पंडित के विस्थापन के दर्द को 2 किरदारों शिव और शांति के माध्यम से कहते हुए लेकर चलते हैं, जिसमें वे काफ़ी हद तक सफल भी रहे हैं।

इस फ़िल्म की एक बड़ी सफलता इसके दो किरदार शिव धर और शांति धर भी हैं जिन्हें बेहद ख़ूबसूरती के साथ आदिल और सादिया ने निभाया है।

ए आर रहमान का स्कोर और संदेश सांडिल्य का म्यूज़िक दोनों बढ़िया हैं।

मुझे लगता है ये फ़िल्म एक बार ज़रूर देखनी चाहिए, पर एक प्रेम कहानी के तौर पर जो एक कठीन समय में जन्म लेती है और 30 साल तक एक बुरे दौर में भी प्यार और पीड़ा के द्वन्द को सहते निभाते हुए अपने ही देश में एक शरणार्थी बन जीती है।